BETI KA PYAR- A CUTE POETRY ON FATHER



आज कुछ पंक्तियां मैंने अपने पापा के लिए लिखी हे । पहले भी बहुत बार लिखना चाहा। मगर
समझ में ही नहीं आया कि क्या लिखूं मगर आज लगता है कि मैं अपनी भावनाओं को अल्फ़ाज़ दे
पायी हु तो सुनती हु।

बड़े भोले से है मेरे पापा और मन के बड़े सच्चे हे।
हमेशा यही कहते हैं कि मेरी दौलत मेरे बच्चे हैं।
हमारी उज्जवल भविष्य के बहुत से सपने उन्होंने सजाये थे।
इसीलिए तो अपना गांव छोड़कर वह शहर में रहने आए थे।
हर बार जब वो स्कूल के एनुअल फंक्शन पर आते थे।
हम में सफल होते देख फूले नहीं समाते थे।
हर छुट्टी वाले दिन पापा घुमाने ले जाते थे ।
सबको पसंद की चीज दिलाते और बाहर खाना खिलाते थे।
उस वक़्त तो पता ही नहीं था होता क्या है गम यूं ही हंसते खिलखिलाते बीत गया बचपन।
सबसे ज्यादा मेरा तो पापा पर ही जोर चलता था।
नजरें दरवाजे पर होती थी।
जब भी दिन ढलता था।
जो भी चाहिए होता था, पापा चट्ट से ले आते थे।
कई बार तो घर आते ही वापस फोटो कॉपी करवाने जाते थे।
कितनी ही हिम्मत बढ़ाकर पापा ने साइकिल चलानी सिखाई थी।
कितना खुश हुई थी मैं जब स्कूटी मुझे दिलाई थी।
पता था कि हर जगह तो पापा साथ नहीं जाएंगे।
पर रास्ते में कहीं रुक गई तो भाग कर वो आ जाएंगे।
पहली बार जो टेढ़ी-मेढ़ी सी रोटी मैंने बनाई थी।
याद है मुझको पापा ने बहुत खुश होकर खायी थी।
मुझसे ज्यादा मेरी लिखी कविताएं मेरे पापा को याद है।
जो भी में बन पायी हूं आज उसकी पापा ही बुनियाद हे ।
सारी उमर अपने गमों को सीने में ही संजोता है।
पर अपनी बेटी की विदाई पर हर पिताजी जी भर के रोता है।
पापा मेरा दिल कहता है कि एक नया जन्म ले लूं।
फिर से तेरे आंगन मैं में गुड़िया बन कर खेलु।।।
फिर से तेरी आंगन मैं में गुड़िया बन कर खेलु।।।


CREDIT: THE POEM WAS WRITTEN BY PALVI GUPTA


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